मकर संक्रांति, लोहड़ी और पोंगल: फ़सल के त्योहार, एक ही भाव
मकर संक्रांति उन गिने-चुने हिंदू त्योहारों में से है जो चंद्रमा की बजाय सूर्य की गति पर आधारित है, इसलिए यह लगभग हर साल 14 या 15 जनवरी को ही आता है। इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तरायण की शुरुआत मानी जाती है, यानी दिन धीरे-धीरे लंबे होने लगते हैं।
मकर संक्रांति का महत्व
यह सर्दियों की फ़सल कटने और नई ऋतु के स्वागत का समय है। किसान अच्छी उपज के लिए सूर्य देव और प्रकृति का धन्यवाद करते हैं। इस दिन गंगा, यमुना और अन्य पवित्र नदियों में स्नान और दान का विशेष महत्व माना जाता है। प्रयागराज में इसी समय माघ मेला लगता है।
तिल और गुड़
संक्रांति पर तिल और गुड़ से बनी चीज़ें — तिल के लड्डू, गजक, रेवड़ी और चिक्की — ख़ूब खाई और बाँटी जाती हैं। सर्दियों में ये शरीर को ऊर्जा और गर्मी देती हैं। महाराष्ट्र में लोग तिल-गुड़ देते हुए कहते हैं — "तिळगुळ घ्या, गोड गोड बोला", यानी तिल-गुड़ लो और मीठा-मीठा बोलो।
देश भर में एक त्योहार, कई रूप
- लोहड़ी (पंजाब, हरियाणा): संक्रांति से एक दिन पहले रात को अलाव जलाया जाता है, उसमें रेवड़ी, मूँगफली, पॉपकॉर्न डाले जाते हैं और लोग भांगड़ा-गिद्धा करते हैं। नई शादी या नए बच्चे वाले घरों में पहली लोहड़ी ख़ास होती है।
- पोंगल (तमिलनाडु): चार दिन का उत्सव। नए चावल, दूध और गुड़ से "पोंगल" पकवान बनाया जाता है, और जब बर्तन में दूध उफनता है तो सब "पोंगलो पोंगल" कहते हैं। तीसरे दिन "मट्टू पोंगल" में गाय-बैलों को सजाकर पूजा जाता है।
- उत्तरायण (गुजरात): आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है। अहमदाबाद का अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव प्रसिद्ध है। इस दिन उंधियू और जलेबी खाने की परंपरा है।
- माघ बिहू (असम): "भोगाली बिहू" में सामुदायिक भोज और "मेजी" (अलाव) जलाने की परंपरा है।
- खिचड़ी (उत्तर प्रदेश, बिहार): इस दिन खिचड़ी बनाने, खाने और दान करने का रिवाज़ है। बिहार में दही-चूड़ा भी ख़ास तौर पर खाया जाता है।
पतंग उड़ाते समय सावधानी
- चीनी मांझा (नायलॉन या काँच लगा धागा) इस्तेमाल न करें, इससे पक्षी, दोपहिया चालक और राहगीर गंभीर रूप से घायल होते हैं। कई राज्यों में इस पर प्रतिबंध है।
- छत की मुँडेर के पास सावधान रहें और बच्चों को अकेले छत पर न छोड़ें।
- बिजली के तारों में फँसी पतंग निकालने की कोशिश न करें।
संदेश
संक्रांति हमें बताती है कि हमारा भोजन किसान, धरती और सूरज की देन है। मीठा बोलना, मिल-जुलकर रहना और ज़रूरतमंदों को दान देना — यही इस पर्व की असली मिठास है।