← Diwali Patakha Photo GIF · लेख

गोवर्धन पूजा और अन्नकूट: प्रकृति और अन्न के सम्मान का पर्व

दीपावली के अगले दिन, कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को, गोवर्धन पूजा की जाती है। उत्तर भारत, विशेषकर मथुरा-वृंदावन और ब्रज क्षेत्र में इसका बहुत महत्व है। इसी दिन मंदिरों और घरों में "अन्नकूट" का आयोजन भी होता है।

गोवर्धन पर्वत की कथा

प्राचीन समय में ब्रजवासी अच्छी वर्षा के लिए हर साल देवराज इंद्र की पूजा करते थे। बालक श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया कि हमारी गायों को चारा, हमें पानी और जीवन देने वाला तो गोवर्धन पर्वत है, इसलिए उसकी पूजा करनी चाहिए। ब्रजवासियों ने ऐसा ही किया। इससे नाराज़ होकर इंद्र ने मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उँगली पर उठा लिया और सात दिन तक सभी ब्रजवासियों और पशुओं को उसके नीचे सुरक्षित रखा। अंत में इंद्र को अपनी भूल का एहसास हुआ। तभी से श्रीकृष्ण को "गिरिधारी" या "गोवर्धनधारी" भी कहा जाता है।

पूजा कैसे होती है

  • घर के आँगन में गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई जाती है और उसे फूलों, दीयों और रुई से सजाया जाता है।
  • गाय और बैलों को नहलाकर सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है।
  • परिवार के लोग गोवर्धन की परिक्रमा करते हैं और भगवान कृष्ण की आरती होती है।
  • मथुरा के पास असली गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करने हज़ारों श्रद्धालु पहुँचते हैं।

अन्नकूट

"अन्नकूट" का अर्थ है अन्न का पहाड़। इस दिन तरह-तरह की सब्ज़ियाँ, दालें, कढ़ी, चावल, पूरी, मिठाइयाँ और पकवान बनाकर भगवान को भोग लगाया जाता है। कई मंदिरों में "छप्पन भोग" लगाया जाता है। फिर यह प्रसाद सबमें बाँटा जाता है। कई जगह मिली-जुली सब्ज़ियों से बनी "अन्नकूट की सब्ज़ी" ख़ास तौर पर बनाई जाती है।

अलग-अलग क्षेत्रों में

गुजरात में दीपावली के अगले दिन को नए साल "बेस्तु वरस" के रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस दिन "बलि प्रतिपदा" या "पाडवा" मनाया जाता है, जिसमें पति-पत्नी के रिश्ते का उत्सव होता है।

पर्व का संदेश

गोवर्धन पूजा हमें सिखाती है कि पहाड़, पेड़, नदियाँ, पशु और खेत ही हमारे जीवन का आधार हैं। प्रकृति का सम्मान और उसकी रक्षा ही सच्ची पूजा है। अन्नकूट हमें अन्न की क़द्र करना और उसे सबके साथ बाँटना सिखाता है — इसलिए इस दिन भोजन बर्बाद न करें और ज़रूरतमंदों तक भी प्रसाद पहुँचाएँ।