गणेश चतुर्थी: स्थापना से विसर्जन तक, और इको-फ्रेंडली गणपति
गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के जन्म का उत्सव है। यह भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को शुरू होता है और कई जगह दस दिन तक, अनंत चतुर्दशी तक, चलता है। गणेश जी को विघ्नहर्ता, बुद्धि के देवता और हर शुभ काम में सबसे पहले पूजे जाने वाले देवता के रूप में माना जाता है।
गणेश जी के जन्म की कथा
मान्यता है कि माता पार्वती ने स्नान से पहले अपने उबटन से एक बालक बनाकर उसमें प्राण डाले और उसे द्वार पर पहरा देने को कहा। भगवान शिव आए तो बालक ने उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। क्रोध में शिव जी ने बालक का सिर काट दिया। माता पार्वती के दुख को देखकर शिव जी ने हाथी के बच्चे का सिर लगाकर बालक को फिर से जीवित किया और उसे सभी गणों का स्वामी "गणपति" बनाया।
सार्वजनिक उत्सव का इतिहास
घरों में गणेश पूजा की परंपरा बहुत पुरानी है। उन्नीसवीं सदी के अंत में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इसे सार्वजनिक उत्सव के रूप में बढ़ावा दिया, ताकि स्वतंत्रता आंदोलन के समय लोग एक जगह इकट्ठा होकर एकजुट हो सकें। आज महाराष्ट्र, ख़ासकर मुंबई और पुणे, के बड़े-बड़े पंडाल पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं।
घर में स्थापना
- घर की साफ़-सुथरी जगह पर चौकी रखकर उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएँ।
- शुभ मुहूर्त में मूर्ति स्थापित करें और "प्राण प्रतिष्ठा" की पूजा करें।
- गणेश जी को दूर्वा (घास), लाल फूल, सिंदूर और मोदक बहुत प्रिय हैं।
- सुबह-शाम आरती करें — "सुखकर्ता दुखहर्ता" और "जय गणेश देवा" आरतियाँ बहुत लोकप्रिय हैं।
- परिवार की परंपरा के अनुसार डेढ़, तीन, पाँच, सात या दस दिन बाद विसर्जन किया जाता है।
मोदक — गणपति का प्रिय भोग
उकडीचे मोदक चावल के आटे के खोल में नारियल और गुड़ भरकर भाप में पकाए जाते हैं। तले हुए मोदक और मावे के मोदक भी बनाए जाते हैं।
इको-फ्रेंडली गणपति
प्लास्टर ऑफ़ पेरिस (POP) से बनी और रासायनिक रंगों वाली मूर्तियाँ पानी में आसानी से नहीं घुलतीं और नदियों-तालाबों को प्रदूषित करती हैं। इसलिए:
- मिट्टी (शाडू माटी) से बनी और प्राकृतिक रंगों वाली मूर्ति लें।
- छोटी मूर्ति का घर में ही बाल्टी या टब में विसर्जन करें और वह मिट्टी गमले में डाल दें।
- कई शहरों में नगर निगम कृत्रिम तालाब बनाते हैं, उनका उपयोग करें।
- सजावट में थर्मोकोल और प्लास्टिक की जगह कपड़ा, कागज़ और फूल इस्तेमाल करें।
विसर्जन
अनंत चतुर्दशी पर "गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या" (अगले बरस जल्दी आना) के जयकारों के साथ विदाई दी जाती है। विसर्जन के समय गहरे पानी में न जाएँ, बच्चों का ध्यान रखें और प्रशासन के निर्देशों का पालन करें।